प्रधानमंत्री से मध्यम वर्ग के व्यक्ति का एक अनुरोध

By | November 12, 2016

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प्रधानमंत्री से मध्यम वर्ग के व्यक्ति का एक अनुरोध मुझे हमेशा से अपेक्षा थी एक ऐसे राजनैतिक नेतृत्व की जिसकी एक आवाज़ के साथ पूरा देश उठ खड़ा हो। 26 मई 2014 को जब नरेंद्र दामोदरदास मोदी जी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी तो ऐसा भान हुआ था कि बरसों की आस पूरी हो गई है।

स्वच्छता अभियान की मुहिम छिड़ी तो महसूस हुआ कि जनता गंदगी फैलाने से किंचित कतराने लगी है। विश्व की सर्वोच्च महाशक्ति का मुखिया जब हमारे प्रधानमंत्री जी को अपना दोस्त कहने लगा तो स्वाभिमान से सीना चौड़ा हो गया।
लोकतंत्र के लिए ऐसे ही नेता की आवश्यकता होती है जो कथनी-करनी की समानता स्थापित कर जनता के दिल में बस जाए। इससे लोकतंत्रिक इमारत की बुनियाद दृढ होती है।

अपेक्षाओं की जिन अट्टालिकाओं का निर्माण इस सरकार ने जनता के मस्तिष्क में किया है उनकी पूर्ति के लिए यह अपरिहार्य है कि समीक्षा, आलोचना और जनमन की संवेदना को सुनने जितना मानस् बनाए रखा जाए।

बहुत तेज़ गति से दौड़ती हुई गाड़ी का स्टीयरिंग कुछ मिलीमीटर हिला दिया जाए तो उसका असर कितना बड़ा कट लेगा यह अनुमान उस गाड़ी के चालक को होना चाहिए। भारत की सामाजिक स्थितियाँ और भारतीय अर्थव्यवस्था का विपरीत परिस्थिति में भी स्थिर रहना इसी कारण संभव था कि हमारे सामान्य जीवन में बचत और भावी संभावनाओं तथा आशंकाओं के लिए अनुमानित राशि जुटाए रखना हमारी आदत में शुमार है।

हम उस देश के वासी हैं जहाँ छोटे बच्चों को जेबख़र्च में से बचत करने के लिए गुल्लक दी जाती है। जहाँ कॉपी के बीच पैसे रख-रख कर बच्चे पिकनिक की योजनाएँ निर्माण करते हैं। इस देश में राखी पर भाई को सरप्राइज़ देने के लिए बहनें पाँच-पाँच,दस-दस रुपये जोड़ती हैं। निर्धन बेटी के घर तीज का सिन्दारा भेजते हुए माएँ चुपचाप पाव भर काजू सबसे छुपा कर रख देना चाहती है ताकि दामाद का स्वाभिमान भी आहत न हो और उसके बच्चों को कुछ पोषण भी मिल जाए। पति की कमाई में से मिलने वाले घरख़र्च को व्यवस्थित करके गृहिणियां अख़बार के नीचे और जीरे वाले डिब्बे में कुछ नोट छुपा लेती हैं ताकि किसी आपातकाल में घर की आर्थिक मदद की जा सके। ताकि पति की आर्थिक तंगी के दौर में बच्चे को चुपचाप एग्जामिनेशन फीस देकर पूरे परिवार को शर्मिंदगी से बचाया जा सके। बुज़ुर्गों ने अपनी पोटलियों में कुछ नोट रखे होते हैं ताकि उनके बुढ़ापे में कोई आर्थिक संकट उत्पन्न न हो जाए।
यह सब धन कालाधन नहीं है।

प्रधानमंत्री से मध्यम वर्ग के व्यक्ति का एक अनुरोधप्रधानमंत्री से मध्यम वर्ग के व्यक्ति का एक अनुरोध
इस देश में शिक्षा और स्वास्थ्य की सेवाएं बहुत महँगी हैं। सरकारी तंत्र के अधीन संचालित अस्पताल और विद्यालयों की स्थिति सर्वविदित है। नागरिक सुरक्षा के लिए किसी को पुलिस सहायता लेनी पड़े तो पुलिसवाले उसे अपमानित करने की स्थिति तक अभद्र हो जाते हैं। इस तंत्र में आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति को ईमानदार हो जाने का उपदेश देना हवाई किले बनाने जैसा विचार है। जिसका बच्चा जीवन-मृत्यु के बीच जूझ रहा हो वह उसका एम्स में दाखिला कराने के लिए रिश्वत न दे तो क्या करे? जिसकी बूढ़ी माँ की टिकट वेटिंग में हो वह सीटें बेचते टीटी को पैसे न दे तो क्या करे?

व्यवस्था ऊपर से सुधारनी होगी हुज़ूर। मध्यमवर्ग इस देश की रीढ़ है। उसकी आवश्यकताएँ और स्थितियां अनदेखी की गईं तो देश की कमर लचक जाएगी। विश्व का कोई भी कानून संवेदनाओं को नियमित नहीं कर सकता। न्यायालय से परास्त होकर सत्य जब मंदिर की देहरी पर सर पटकता है तो उसकी पुकार उसके इर्दगिर्द सांत्वना का घेरा निर्मित कर देती है। हमने हरिश्चंद्र और श्रवण कुमार की कहानियाँ सुनकर जीवन प्रारम्भ किया है। इस देश का गृहस्थ जब अपने बच्चों की ओर देखता है तो कानूनी पचड़ों से बचने के लिए पूरी तरह ईमानदार हो जाने की कोशिश करता है लेकिन व्यवस्था की दीमक उसे बेईमानी और कर चोरी की दलदल में खींचे लिए जाती है।

नोट बंदी के इतने आकस्मिक निर्णय पर भी यह मुल्क अथाह चुनौतियों से जूझने के बावजूद मौन है। सबकी आपसे अपेक्षाएँ हैं कि भविष्य उज्ज्वल करने के लिए यह कष्ट झेलना आवश्यक है। लेकिन इन्हीं तीन दिनों में इस तंत्र के अस्पताल, पुलिस, यातायात तथा अन्य आवश्यक सेवाओं ने जनता की जान ले ली है। जिस पिता की बच्ची एम्बुलेंस चालक द्वारा पुराने नोट न लिए जाने के कारण दम तोड़ गई उससे संयम रखने को कैसे कहा जाए? जिसकी बेटी की शादी नियत दिन नहीं हो सकी उस परिवार से संयम का अर्थ पूछिये। जिस किसान का खेत 8 नवम्बर को दिन में बिका था उससे इस निर्णय की कीमत पूछिये।

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मेरे मन में प्रधानमंत्री के किसी निर्णय के प्रति कोई द्रोह नहीं है लेकिन इस देश की लोकतान्त्रिक आत्मा को इतना आहत न कीजिए कि किसी नागरिक को आपके निर्णय पर प्रश्न पूछने तक का अधिकार न दिया जाए। बड़े फैसले कड़े हों तो हज़ारों दोषियों के साथ कुछ निर्दोष भी कष्ट झेलते हैं किन्तु उन निर्दोषों को सिसकने भर की भी इजाज़त न हो तो यह शोचनीय है। “जो भी देशभक्त नहीं है वह नोटबंदी के विरोध में है” -क्या यह वाक्य लोकतान्त्रिक व्यवस्था में उचित ठहराया जा सकेगा?

प्रधानमंत्री से मध्यम वर्ग के व्यक्ति का एक अनुरोध
आपने दो हज़ार का नोट जनता के हाथ में थमा तो दिया लेकिन सौ के नोट की आपूर्ति न होने की वजह से वह नया नोट भी कागज़ के एक टुकड़े से अधिक कुछ नहीं है। कालेधन के बड़े भंडारों में सौ के नोट की गड्डियां कैद हो गई हैं। बाज़ार में छुट्टे के अभाव में अराजकता और कालाबाज़ारी से लेकर मुनाफाखोरी और कृत्रिम अनापूर्ति तक की स्थिति बढ़ती जा रही है।

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आज के अख़बार में आपका जाम के साथ चाय का गिलास टकराकर जश्न मनाता हुआ चित्र देखा। आपकी विश्वविजय की हर यात्रा मन को प्रसन्न करती है किन्तु आज यह चित्र अच्छा नहीं लगा। यूं लगा ज्यों किसी ने दुधमुहों के नसीब से दूध छीन कर अपने लिए चाय बना ली हो। आपके भाषणों से लगता है कि आप संवेदनशील व्यक्ति हैं। आप इस बात से अनभिज्ञ नहीं हैं कि आपके एक आकस्मिक निर्णय से देश की जनता किन मुसीबतों को झेल रही है।

प्रधानमंत्री यह भी जानते हैं कि कर अदायगी के बावजूद एक ईमानदार आदमी देश में दैनिक आवश्यकता की वस्तुएं नहीं जुटा पा रहा है। इतने जनव्यापी संकट के समय आपके वित्त मंत्रालय ने पूरे पृष्ठ का विज्ञापन छाप कर “संयम बरतने की अपील” की है। लेकिन ज्यों ही पृष्ठ पलटा तो आपका जश्न मनाता हुआ चित्र दिखा। आपके पास इतने शानदार मीडिया प्रबंधक हैं, क्या इस संकट की घड़ी में इस चित्र को छापना सचमुच अपरिहार्य था। लोग नमक को तरस रहे हैं और आपका चित्र लोगों के ज़ख्मों पर नमक छिड़क रहा है।

क्षमा कीजियेगा प्रधानमंत्री जी, नीति कहती है कि जिस शासक की जनता भूखी सो रही हो उसे भरपेट भोजन करने का भी अधिकार नहीं है ऐसे में कोई अपनी नीति के क्रियान्वयन की अपरिपक्वता से आहत होकर आह भरना चाहे तो उसको देशभक्ति के आडम्बर से दबाकर विदेश में जश्न मनाना न तो प्रधानमन्त्री का धर्म है न प्रधानसेवक का।

-एक भारतीय करदाता

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